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बद्दुआ असर तो करती है,

वो ख़ुद गुलाब है उन्हे क्या गुलाब दू,

तू जो स्वीकार कर ले प्यार मेरा

जो नज़रे सिर्फ़ मुझे दिखने के लिए उठा करती थीं

पिता है तो हर सपने में जान है

मुझे हकीम चाहिए नब्जो का

आजाओ ये महफ़िल आशिको की हैं

मोहब्ब्त कभी झूठी नहीं होती जनाब

जयपुर मैं कमाने आया

उसका दिनों दिन बातें कम करना

ये तो शुरुआत है सुबह की